भारत में रेलवे का विकास 

भारत में सर्वप्रथम 1831-32 ई० में मद्रास और बैंगलोर के मध्य रेल निर्माण की योजना बनाई गई। परन्तु यह रेलगाड़ी अपनी गति के लिए पशुओं पर निर्भर थी। 1841 ई० में एक अंग्रेज सिविल इंजीनियर जोजफ लाॅक ने कलकत्ता से दिल्ली तक रेल चलाने की सम्भावनाओं के बारे में कलकत्ता से उत्तर- पश्चिम सीमा प्रान्त तक रेलवे लाईन बनाने का एक प्रस्ताव बंगाल सरकार के सामने रखा और इसके लिए इंग्लैंड में एक कम्पनी की भी स्थापना की। ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने इन गैर सरकारी कम्पनियों के प्रस्तावों पर कोई विशेष उत्साहित नहीं दिखाया। इसका प्रमुख कारण इन रेलवे कम्पनियों के साथ किए जाने वाले समझौतों की शर्तों को लेकर निश्चय न हो पाना था।

Indian first train

1848 ई० में जब लार्ड डलहौजी गवर्नर जनरल बनकर भारत आया उसने अनुभव किया कि भारत में ब्रिटिश साम्राज्य को सुदृढ और सुरक्षित करने के लिए सैनिक छावनियों की अधिक आवश्यकता होनी चाहिए और उन समस्त छावनियों को रेल मार्गों द्वारा एक-दूसरे के साथ जोड देना चाहिए।  अतः उसने भारत में रेल परिवहन के निर्माण और विकास की सारी व्यवस्था कर दी।

पुरानी गारण्टी प्रणाली ( 1849-1869 ई०)

रेल निर्माण की दिशा में ईस्ट इण्डिया रेलवे कम्पनी और ग्रेट इण्डिया पेनिन्स्युलर रेलवे कम्पनी नामक दो प्राइवेट कम्पनियों ने कलकत्ता से उत्तर-पूर्व एवं बम्बई से पूर्व तथा उत्तर तक रेल-पथ के निर्माण के प्रस्ताव रखे। सरकार ने 1849 ई० में इन कम्पनियों के साथ जो समझौता किया उसे पुरानी गारण्टी पद्धति कहते हैं।

इसकी प्रमुख शर्तें निम्न प्रकार है-

  • रेलवे कम्पनियों को सरकार ने नि:शुल्क भूमि दी जिस पर रेल लाईन बनाने थी।
  • सरकार द्वारा विनियोजित पूंजी पर निजी कम्पनियों द्वारा रेलवे के निर्माण कार्य के लिए कम्पनियों को 5% वार्षिक ब्याज की गारण्टी दी गई। 
  • 25 या 50 वर्ष के पश्चात सरकार को कम्पनियों से रेलों को खरीद लेने का अधिकार होगा।
  • रेल कर्मचारियों की नियुक्ति, रेल भाड़ा इत्यादि सभी कार्य सरकार करेगी कम्पनी नहीं।

पुरानी गारण्टी प्रणाली के तहत भारत में सर्वप्रथम बम्बई से थाना तक 16 अप्रैल 1853 ई० को रेल-पथ बना जो 21 मील लम्बा था। यह यात्री यातायात के लिए भारत में पहली रेलवे थी। ईस्ट इण्डियन रेलवे के हावड़ा से हुगली तक के 23 मील लम्बे प्रथम खण्ड का उद्घाटन 15 अगस्त 1854 ईस्ट को किया गया जिससे पूर्वी में रेल परिवहन की शुरुआत हुई। 1854 ई० से 1856ई० तक तीन महत्वपूर्ण रेल-पथों का निर्माण किया गया -

  1. बम्बई से कल्याण रेल-पथ, जो 37 मील लम्बा था, 
  2. कलकत्ता से रानीगंज रेल-पथ,  जो 121 मील लम्बा था, और  
  3. मद्रास से आर्काट रेल-पथ,  जो 65 मील लम्बा था। 
1869 ई० तक भारत में 11 बड़े रेलमार्ग थे।

दोष -

पुरानी गारण्टी प्रणाली दोषपूर्ण सिद्ध हुई। इससे निर्माण पर फालतू खर्च होने लगा एवं भारतीय जनता पर करों का बोझ लादेन दिया गया। करों से होने वाली आमदनी ब्याज के रूप में अंग्रेज हिस्सेदारी की जेब में जाती थी।1869ई० में गवर्नर जनरल जाॅन लारेंस द्वारा इस प्रणाली को समाप्त कर दिया गया।

राज्य द्वारा रेल निर्माण कार्य-

भारत सरकार ने 1869 ई० से 1882 ई० तक नई रेलवे-पथ बनाने का कार्य अपने ऊपर ले लिया। परन्तु सरकार ज्यादा समय तक इस काम को ठीक प्रकार न कर सकी तथा उसने पुन: पुरानी कम्पनियों का सहयोग लेने का निर्णय लिया।

नवीन गारण्टी प्रणाली ( 1882 ई० - 1924 ई०) -

इस बार रेल निर्माण के लिए सरकार ने निजी कम्पनियों के साथ समझौते की नई शर्तें रखीं। अत: इसे नवीन गारण्टी प्रणाली के नाम से जाना जाता है। इसकी मुख्य शर्तें इस प्रकार थीं-

  • रेलवे कम्पनियों द्वारा बनाई जाने वाली रेलवे-लाईनों का प्रबन्ध तो कम्पनियों के हाथों में रहेगा। किन्तु ये प्रारम्भ से ही भारत सचिव की सम्पत्ति मानी जाएगी। 
  • भारत सचिव 25 वर्ष बाद तथा इसके उपरांत दस साल के अन्तराल के बाद कम्पनियों की पूंजी लौटाकर अनुबन्ध समाप्त कर सकेगा। 
  • कम्पनियों को उनके द्वारा निवेशित पूंजी पर साढ़े तीन % की ब्याज की गारण्टी दी जाएगी। 
  • रेलवे से प्राप्त शुद्ध लाभ में से कम्पनियों को 40% और सरकार को 60% हिस्सा मिलेगा।

नवीन गारण्टी प्रणाली के अनुसार 1882 ई० से 1924 ई० तक रेल निर्माण का कार्य किया गया। 1882 ई० से 1900 ई० तक रेलों के विकास में तेजी आई। वर्ष 1905 ई० में रेलों के प्रबन्ध के लिए लॉर्ड कर्जन ने वाणिज्य एवं उद्योग विभाग के तहत एक रेलवे बोर्ड की स्थापना कर दी जिसमें एक अध्यक्ष एवं दो सदस्य की नियुक्ति की गई। प्रथम विश्वयुद्ध के समय भारत में रेल विकास के कार्य की प्रगति धीमी हो गई परन्तु 1920 ई० में विलियम एकवर्थ समिति बनने के साथ ही रेलवे का विकास पुन: होने लगा। इस समिति ने रेल प्रबन्ध में सुधार लाने के लिए निम्न सिफारिशें कीं -

  • रेलवे का राष्ट्रीयकरण करना और निजी कम्पनियों के प्रबन्ध एवं स्वामित्व को समाप्त करना।
  • रेलवे बोर्ड का विस्तार करना और इसके अधिकार क्षेत्र में वृद्धि करना
  • सामान्य सार्वजनिक बजट से रेलवे के बजट को अलग करना।
सरकार ने एकवर्थ कमेटी की सिफारिशों को मान लिया। इसके अनुसार समझौतों की समाप्ति के पश्चात की रेलवे लाईनों को सरकार के नियन्त्रण में लाया गया। 1922 ई० को रेलवे बोर्ड को पुनर्गठित किया गया तथा एक सलाहकार समिति बनाई गई। 1924 ई० में रेलवे बजट को अलग कर दिया गया। इन सब सुधारों के फलस्वरूप रेलवे का विस्तार हुआ। 



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